सर्दियों के मौसम के साथ फल आपके स्वास्थ्य के लिए काफी लाभदायक होते हैं। सर्दियों के मौसम के आगमन के साथ, फलों के विकल्प में या तो सेब या अन्य खट्टे फलो की किस्म होती है। यह फल, खाने पर लोगों को पोषण प्रदान करते हैं। मौसमी परिवर्तनों की वजह से आपके शरीर में सर्दी, खांसी और बुखार जैसी सामान्य समस्याएं पेश आ सकती हैं। सर्दियों में अगर ठिठुरती ठंड से बचना है तो अपने भोजन में फलों को जरूर शामिल करें। सर्दियों में फलों को खाने से हेल्थ के साथ-साथ शरीर में जरूरी पोषक तत्व भी बने रहते हैं। आइए जानते हैं कि सर्दियों में कौन-से फल हैं आपकी सेहत के लिए बेस्ट। सेब -
सेब किसी भी मौसम के लिए सबसे अच्छा फल माना जाता है। सर्दियों में रोजाना एक सेब का रस हेल्थ के लिए फायदेमंद होता है। इसको खाने से दिल और रोग-प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती है। इसके साथ ही सेब भूलने की बीमारी को भी दूर करता है।
स्वीट पोटैटो -
अगर आपको आलू खाना पसंद नहीं तो स्वीट पोटैटो अर्थात शकरकंद खाएं। इसके सेवन से शरीर में विटामिन ए और सी के स्तर बढ़ता है। क्योंकि ये शरीर को गर्म रखते हैं, इसलिये सर्दियों में जड़ों वाली चीजें खाना बेहत फायदेमंद होता है। साथ ही शकरकंद डायट्री फाइबर और कार्बोहाइड्रेट से भरपूर होती है।
अमरूद -
सर्दियों में अमरूद को फलों का राजा कहा जाता है। इसमें मौजूद पौष्टिक तत्व शरीर को फिट, स्वस्थ रखने के साथ-साथ इम्यूनिटी बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यह हाइपोग्लीसेमिक ब्लडप्रेशर और कोलेस्ट्रॉल के स्तर को कम करने में फायदेमंद है। इसमें मौजूद पेक्टिन फाइबर पाचन बढ़ाने और भूख में सुधार करने में मदद करता है।
अनार -
हर व्यक्ति को इस फल का सेवन करना चाहिए, क्योंकि इसके कई सारे स्वास्थ्य होते हैं। अनार के रस का सेवन करने से आपकी प्रतिरोधक क्षमता में काफी इज़ाफ़ा होता है और आप फ्री रेडिकल्स से भी दूर रहते हैं।
अंगूर -
अंगूर विटामिन, मिनरल्स, काबरेहाइड्रेट, ग्लूकोज जैसे पौष्टिक तत्वों और पोली-फिनॉल, एंटीऑक्सीडेंट, एंटी बैक्टीरियल, फाइटोन्यूट्रिएंट्स गुणों से लबरेज है। इसमें मौजूद शर्करा रक्त में आसानी से अवशोषित हो जाती है और थकान दूर कर शरीर को ऊर्जा प्रदान करती है। कोलेस्ट्रॉल कम करने में सक्षम अंगूर के सेवन से हृदय रोग का खतरा कम रहता है। यह रक्त विकारों को दूर कर क्लींजर का काम करते हैं।
संतरा -
संतरा में विटामिन सी प्रचुर मात्रा में होता है। इसके सेवन से सर्दी-जुखाम जैसी समस्याएं नहीं होती और रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ जाती है। लोग तो यह भी कहते हैं कि यदि रोज संतरा खाया जाए तो आपको घर में एंटीबायॉटिक दवाएं रखने की जरुरत नहीं पड़ेगी।
क्या आप जानते हैं लीची मीठा फल होने के साथ-साथ आपकी किस्मत भी चमकाता है। लीची बहुत ही मीठा और रसीला फल होता है। लीची शुक्र और बुध का होता है।
घर में लीची जरूर रखना चाहिए। इसको गर्मियों का रसगुल्ला कहा जाता है। बिहार, असम, बंगाल और आंध्र प्रदेश में लीची के बहुत से पेड़ पाये जाते है।
जाने क्या-क्या हैं लीची के फायदे :-
यादाश्त को बढ़ाता है लीची -
जो बच्चे दिमाग के कमज़ोर होते है। पढ़ाई-लिखाई में जिनका दिमाग नहीं चलता है। मैथ,साइंस,कॉमर्स में कमज़ोर होते है उन्हें लीची खानी चाहिए।
जो बड़े, बूढ़े, बुज़ुर्ग होते है, जिनकी याददाश्त कम होने लगती है उनको भी लीची खानी चाहिए।
गर्मी से बचाती है लीची -
गर्मी के दिनों में हाथ,पैरों और आँखों में बहुत जलन होती है। प्यास बहुत लगती है, पानी पीते-पीते पेट फूलने लगता है खाना खाने की इच्छा नहीं होती ऐसे में लीची का जूस पीने से गर्मी कम लगती है। लीची दिल की धड़कन को काबू करता है -
जिनकी दिल की धड़कन तेज़ होती है। बहुत से लोगो को ब्लड प्रेशर की बीमारी होती है। नसों में कोलेस्ट्रॉल जमा हो जाता है। रोज़ सुबह दो बिस्कुट खाकर लीची का जूस पीना चाहिए।
जिनको शुगर है वह करेले का जूस और खीरा का जूस के साथ मिलाकर पीएं।
मुजफ्फरपुर जिले की शाही व चाइना के साथ अब लोग तीन अन्य नई प्रजातियों की लीची का भी स्वाद ले सकेंगे। इतना ही नहीं दो माह ज्यादा तक इसका स्वाद मिल सकेगा। इसका लाभ देश के 20 राज्यों के किसान उठा रहे हैं, लेकिन जागरूकता के अभाव में सूबे के किसान सिर्फ शाही व चाइना लीची की पैदावार तक ही सीमित हैं।
नई प्रजाति की लीची का नाम गंडकी संपदा, गंडकी लालिमा व गंडकी योगिता है।
मई के अंत से शुरू हो जाता सीजन :-
शाही लीची का सीजन मई के अंत तक शुरू हो जाता है। जो करीब 15 दिनों तक रहता है। इसके बाद दस दिनों तक चाइना लीची। राज्य के किसान की बागवानी भी यही तक सीमित रहती है। जबकि वे नई प्रजाति गंडकी संपदा, गंडकी लालिमा व गंडकी योगिता की पैदावार भी कर सकते हैं। प्रत्येक प्रकार की लीची की अवधि दस दिनों की रहती है।
ऐसे करें बागवानी :-
इन नई प्रजातियों की लीची के लिए किसानों को तैयारी शाही लीची की तरह ही करनी चाहिए। जून से फरवरी तक कैलेंडर बनाकर बागवानी करनी पड़ेगी। नहीं तो कीड़े व मिठास में कमी आदि होने की समस्या भी आएगी। किसानों को जून में पेड़ों की छंटाई व जुलाई में खाद डालनी चाहिए। जुलाई में ही पेड़ से कल्ले फूटते हैं। अगर कमजोर कल्ले हैं तो किसानों को अधिक मेहनत करनी पड़ेगी।
कनेर के पेड़ आसानी से बहुतायत में कहीं भी मिल जाते हैं। इनकी चार प्रजातियां सफेद, पीला, लाल और गुलाबी फूलों वाली होती हैं। जिनमें पीले और सफेद कनेर का औषधीय उपयोग अधिक होता है।
कनेर के फूल खासकर गर्मियों में ही खिलते हैं। कनेर के पेड़ को कुरेदने या खरोचने से बहुतायत में दूध निकलता है। इसकी फलियां चपटी गोलाकार पांच से छ: इंच वाली होती हैं।
कनेर का जहर डाइगाक्सीन की तरह होता है जो हदय की धड़कन को कम करता है। कनेर का एक बीज डाइगाक्सीन के सौ टेबलेट के बराबर असर करता है। इससे इस पौधे के उपयोग और असर के बारे में सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। इनके सभी अवयवों का हम औषधीय लाभ लेते हैं।
दिल के दर्द के लिए -
भोजन के बाद कनेर की जड़ की छाल का 100-200 मिलीग्राम पीसकर पानी के साथ या सुखा लें, इसको लेने से बार- बार पेशाब आता है जिसके कारण दिल का दर्द दूर हो जाता है। इसको लेने से अन्य हृदय से संबंधित विकारों का इलाज भी होता है।
दांतों के लिए इसका उपयोग एक टूथब्रश के रूप में -
भारत में कई लोग टूथब्रश के रूप में नीम की टहनियाँ या कुछ अन्य पौधों की पतली शाखाओं का उपयोग करना पसंद करते है, सफेद कनेर या ओलियंडर की शाखा दांत ब्रश करने के लिए इस्तेमाल की जा सकती है, इसका उपयोग करने से दांतो में खून आने की समस्या ठीक होती है और दांत मजबूत बनते है।
सर के दर्द के लिए -
कांजी जो भारत में होली के त्योहार पर पिया जाने वाला पेय है और इसको बीटरुट, गाजर और सरसों का उपयोग करके तैयार किया जाता है। इसमें करौंदे के साथ कनेर या ओलियंडर के फूल पीसकर इसका लेप बना लें। माथे पर इस लेप को लगाने से बहुत राहत मिलती है।
पाइल्स के लिए -
ठंडे पानी के साथ कनेर या ओलियंडर की जड़ को पीसकर फोड़े पर लगाए, फोड़े हाथ लगाने से फूट सकते है इसलिए इसको सहजता से लगाना चाहिए। यह फोड़े ठीक करके पाइल्स के इलाज़ में मदद करता है।
फेस पैक के रूप में -
सफेद कनेर या ओलियंडर के फूल पीस लें और इसे चेहरे पर लगाए, इसका उपयोग करने से त्वचा के रंग में सुधार आता है और चेहरा चमकदार बनता है।
नेत्र रोग में -
कनेर के पौधे की जड़, सौंफ और करंज के पत्ते को पीसकर पानी में मिलाकर आंखों में लेपन करने से संबंधित रोगों में लाभ होता है।
अर्श रोग में -
कनेर की जड़ को पीसकर ठंंडे पानी के साथ लगाने से अर्श रोगों में लाभ होता है।
दर्द में राहत हेतु -
कनेर के ताजा फूल 50 ग्राम, 200 ग्राम जैतून तेल और 100 ग्राम के अन्य तेल के मिश्रण को दर्द वाले नसों पर मालिश करने से लाभ होता है। इसी तरह काला धतूर, सफेद कनेर की जड़ को पीसकर तेल में मिलाकर पक्षाघात के रोगियों में लगाने से लाभ होता है। इसी तरह यह चर्म रोग, कुष्ठ रोग, खुजली, सर्प दंश, कृमि रोग और कफ वात नाशक होती है।